अपनो पर रहम, गैरो पर सितम की कहानी हो रही चरितार्थ
ब्यूरो रिपोर्ट
कुशीनगर: जनपद के पुलिस विभाग में हो रहे ट्रांसफर ,पोस्टिंग व लाइनहाजिर का खेल खूब सुर्खियां बटोर रहा है। चर्चा है कि, जिस प्रकार जियो के रिचार्ज की समयावधि होती है। उसी तरह यहां कमान सौंपी जा रही है, और फिर स्थानांतरण की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। अब इसके पीछे की कहानी, तो जिले में चर्चा का विषय है। वैसे जो भी हो विभाग में इस ट्रांसफर पोस्टिंग के खेल की खूब चर्चा भी हैं, कि आखिर 3 माह के बाद ही हटाने का खेल क्यों हो रहा है। विभागीय सूत्र तो बताते हैं कि, रिचार्ज की व्यवस्था के तहत यह खेल हो रहा है। अब जो भी हो, यह तो अंदर की बात है।
आपको बता दें कि, कुशीनगर के थाने व चौकी जियो के रिचार्ज की तरह बन गए है। आंकड़े भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं। बिगत एक वर्ष में ट्रांसफर पोस्टिंग पर नजर दौड़ाई जाय, तो दिलीप पांडेय को हनुमानगंज व सेवरही की कमान दी गयी, लेकिन उन्हें तीन माह के अंदर ही हटा दिया गया। संजय सिंह को विशुनपुरा, हाटा व पटहेरवा की कमान दी गयी, उन्हें भी तीन महीने से अधिक कहीं रहने नही दिया गया। राहुल सिंह को तरयासुजान व अहिरौली बाजार की जिम्मेदारी दी गयी, उनके साथ यही व्यवस्था अपनाई गयीं। उमेश कुमार, अनिल कुमार, राशिद खान, सुनील सिंह, जेपी पाठक को भी तीन माह के अंदर ही हटा दिया गया हैं।
वहीं भगवान सिंह को बहादुरपुर, कुबेरस्थान, कप्तानगंज और नेबुआ नौरंगिया में पोस्टिंग, 3 महीने तक भी रुकने नही दिया गया। शैलेंद्र सिंह को कप्तानगंज, पडरौना, कुबेरस्थान, नेबुआ नौरंगिया भेजा गया। राजीव सिंह को फाजिलनगर, बहादुरपुर, कप्तानगंज और फिर सम्मन सेल भेजा गया। राकेश रोशन सिंह अहिरौली बाजार, रामकोला, कसया, हाटा, समउर बाजार, तमकुही और फिर पुलिस लाइन भेजा गया। दीनानाथ पांडेय को कप्तानगंज, पड़रौना, खड्डा, रविन्द्रनगर भेजा गया, तो वही विशाल सिंह को डीसीआरबी, कुशीनगर, मधुरिया, तुर्कपट्टी, हनुमानगंज भेजा गया। वेदप्रकाश सिंह को रामकोला, हनुमानगंज, कप्तानगंज भेजा गया। ये आंकड़े इतना तो जरूर ही बताते हैं कि, पुलिस कप्तान को अपने ही मातहतों पर विश्वास नही है और इन्हें तास के पत्तो की तरह फेट कर कही टिकने ही नही दिया गया है। जिससे इन पुलिसकर्मियों का मनोबल गिरा हुआ है।
वहीं हरेंद्र मिश्रा जिन्हें जनपद में आते ही पटहेरवा, हाटा में लंबे समय तक जिम्मेदारी दी गयी हैं और फिर जनपद के मलाईदार थानों में शुमार तरयासुजान की कमान सौंप दी गयी हैं। आखिर क्या कारण है कि, उन्हें हाइवे के किनारे वाले मलाईदार थानों की ही कमान सौपी जाती है, यह चर्चा में है। जबकि कोई गुडवर्क इनके खाते में नही हैं। ज्ञानेंद्र राय कसया लगभग 8 माह रहे और जिनके कार्यकाल में बदमाशों ने असलहा लहराते हुए विधायक के घर पहुच कर जान से मारने की धमकी तक दे डाली थी, एक सप्ताह के बाद भी पुलिस हाथ मलती रही थी और बाद में पुलिस ने मैनेज के खेल के तहत बदमाशो को पकड़ा था।
इसी तरह अन्यत्र घटनाओ के खुलासे में फिसड्डी साबित होने के वावजूद उन्हें कप्तानगंज थाने की कमान सौप दी गई, और वह चार महीना भी हाइवे से दूर रहे, उसके बाद फिर उन्हें हाइवे के थाना हाटा की कमान दे दी गयी हैं। अनुज कुमार सिंह खड्डा, कप्तानगंज के बाद कसया व नेबुआ नौरंगिया जैसे मलाईदार थानों की कमान दी गयी हैं। इनके ही प्रताड़ना से तंग आकर खड्डा में एक युवक ने सुसाइड कर लिया था, जो मामला चल ही रहा है, तो वहीं कप्तानगंज में एक स्थानीय पत्रकार और कसया में खबर से खार खाकर एक अखबार के जिला प्रभारी को फर्जी मुकदमे में जेल भेज दिया गया, और एक भाजपा नेता की पिटाई के साथ गाड़ी सीज कर दिया तथा समर्थको पर खूब लाठियां बरसाई। इतने विवादों में रहने के बाद भी थानों की कमान सौंपी गई हैं और अन्य की हल्की सी शिकायत पर ही उन्हें बलि का बकरा बना दिया जाता है। पवन सिंह पड़रौना की कमान 10 माह से लगातार संभाल रहे है जिनका एक ऑडियो भी वायरल हुआ था, जिसमे उनके द्वारा महामहिम राष्ट्रपति को भी जेल भेजने की बात करते हुए सुनाई देते हैं, और एक पत्रकार को धमका भी रहे हैं। फिर भी उन्हें नही हटाया गया। ये वही थाना प्रभारी है, जिन्होंने जटहा बाजार में आंदोलन कर रहे किसानों पर गोलियां चलवाई, जिसमे उनकी सर्विस रिवॉल्वर गायब हो गयी और मुकदमा भी दर्ज हुआ। इन सबके वावजूद लम्बे समय एक थाने की कमान देना अपनो पर रहम गैरो पर सितम की कहानी खुद ही बया कर रही है।
संजय मिश्रा जो लंबे समय तक पटहेरवा, रामकोला व नेबुआ नौरंगिया में चार्ज पर रहे, जिन्हें जमातियों के मामले में रिपोर्ट में हेराफेरी पर निलम्बित कर दिया गया और पुनः दो माह के अंदर ही कप्तानगंज थाने का प्रभार दे दिया है। रामाशीष यादव को खड्डा नगर पालिका कर्मचारी से मारपीट के मामले में निलंबित कर दिया गया, फिर दो माह के अंदर ही हनुमानगंज और फिर एक माह बाद ही कसया का चार्ज दे दिया गया। वही विवेकानंद यादव के आडियो पर कार्रवाई होती हैं और उन्हें लाइन हाजिर किया जाता है, फिर दो माह के अंदर खोटही चौकी इंचार्ज बना दिया जाता हैं। जबकि विभागीय सूत्र बताते हैं कि, निलम्बित दरोगा या इंस्पेक्टर को छः माह तक थाने का प्रभार नही दिया जा सकता हैं, लेकिन यहां तो अपनो के लिए नियम कायदा कोई मायने नही रखते है। कुछ एसआई जैसे निरंजन राय जिनका भ्रष्टाचार से संबंधित आडियो वायरल हुआ, लेकिन उसकी जांच न करते हुए उन्हें विशुनपुरा भेज दिया गया। दीवाकर मिश्रा जो लगभग डेढ साल से बासी पुलिस चौकी और पुरुषोत्तम राव सेवरही पुलिस चौकी पर लंबे समय से जमे हुए हैं। रमेश पूरी का मधुरिया, तमकुही और समउर चौकी पर रखा जाना भी चर्चा में है, कि उक्त एसआई को हाइवे के किनारे ही क्यों रखा जाता हैं। ज्योति कुमार सिंह के खिलाफ पूर्व में भ्रष्टाचार के मामले में चल रहे हैं, लेकिन उन्हें कसया जैसे चौकी की कमान सौंपी गई है। जिनके खिलाफ लाकडाउन में एक मौलाना के साथ लाकडाउन में जाना चर्चा के केन्द्र में रहा। फिर भी उनपर रहम दिखाई जा रही है।
ये तमाम आंकड़े खुद ही बया कर रहे हैं कि, कुशीनगर में सबकुछ ठीक नही चल रहा है और यहां तो अपनो पर रहम, गैरो पर सितम व फिर ट्रांसफर पोस्टिंग का खेल चल रहा है। दूसरी बात यहां कार्यालय में तैनात खासम खास के इतने जलवे है कि, लाइनहाजिर सिपाही उनके माध्यम से एक सप्ताह के अंदर ही बहाल हो जाता हैं, और एक एसआई को प्रताड़ित करने के उद्देश्य से एक के बाद एक फाइल खोल दी जाती हैं। फिर भी कुशीनगर में पुलिस का इकबाल बुलंद है, और मातहतो के साथ जनता उत्पीड़न से त्रस्त हैं। इस तरह तमाम ऐसे कारनामे पशु, शराब तस्करी सहित अन्य भ्रष्टाचार से संबंधित आडियो तो वायरल हुए, लेकिन विजातीय को सजा दी गयी और सजातीय के खिलाफ जांच को दरकिनार कर उन्हें मलाईदार जगहों पर पोस्टिंग दे दी गयी। चर्चा तो ये है कि, गोरखपुर मण्डल में विजातीय दरोगाओं की फाइल की एक के बाद एक फाइले खोली गई और सजातीय को अभययदान दे दिया गया, अब फाइल खोलने के पीछे की कहानी तो सर्वविदित है, कि फाइल किस उद्देश्य को लेकर उच्चाधिकारी खोलते हैं, इसके पीछे की कहानी तो विभागीय लोगो में चर्चा में है। अगर कुछ होगा तो धुंआ तो जरूर उठेगा। फिर भी अपनो पे रहम रहम गैरो पर सितम ..........
काश शासन भी पुलिसकर्मियों के दर्द को समझती और उन्हें भी शोषण से निजात मिलती।

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