"होली-गीत" बम सररर-कबीर"
¶लाल - लाल हाँथ बिच लालै गुलाल लै,¶नायिका के गाल मध्य जब ही लगायो है,
¶रक्त वर्ण गाल बिच लालै गुलाल लगि,
¶लालिमा को दूनी कर शोभा बढ़ायो है,
¶हट्ट कहि लजाई - मुस्काई झट भागि चली,
¶देखि लेब बच्चू कहि झूठै गुस्सायो है।
¶रचयिता~कमल बाजपेयी

1 टिप्पणियाँ
चाँद हंसने लगा रूत गुलाबी हुई...... वाह !
जवाब देंहटाएंबहुत मधुर शब्दों से सुसज्जित कविता l
रमेश उत्तम