वे अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी की हार में मान रहे अपनी जीत।। Raebareli news ।।

हम तो डूबेंगे ही सनम, तुमको भी ले डूबेंगे।

रजनीकांत अवस्थी

महराजगंज/रायबरेली: त्रिस्तरीय पंचायती चुनाव के पहले चरण में 15 तारीख को हुए मतदान के बाद जहां विभिन्न पदों पर किस्मत आजमा रहे प्रत्याशी अब अपनी थकान उतार कर आगामी दो मई को होने वाली मतगणना का इंतजार कर रहे हैं। थकान की खुमारी उतरने के बाद अब हर एक प्रत्याशी अपने समर्थकों के साथ बैठकर वोटों की गणना से पहले अपने अपने प्रदर्शन की गणित जोड़ने में मशगूल है। सबसे पहले चर्चा जिला पंचायत की महराजगंज प्रथम सीट को लेकर है, जोकि पूरे जिले की सबसे चर्चित जिला पंचायत की सीट रही है। यहां पर कुल 17 प्रत्याशी किस्मत आजमा रहे थे, जिनमें कई बड़े राजनीतिक दलों की ओर से अधिकृत प्रत्याशी के साथ साथ वोटकटवा के रूप में उसी पार्टी के दो दो तीन तीन समर्थक मैदान में उतरे थे। जिनका लक्ष्य स्वयं जीत का नहीं बल्कि अपनी ही पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी को कमजोर करना था। अब गांव के होटलों, चौराहों, पान की गुमटियों में इसी बात के चर्चे हैं कि, फला हारेगा तो वह किसी और से नहीं बल्कि अपने ही बागी लोगों के द्वारा वोटों में सेंधमारी करने की वजह होगी।

   आपको बता दें कि, महराजगंज प्रथम से सबसे बड़ी दावेदारी भाजपा और सपा की ओर से प्रस्तुत की गई थी। जिसमें भाजपा ने टिकट देने से पहले काफी उतार-चढ़ाव आए, टिकट वितरण में पूर्व भाजपा विधायक राजाराम त्यागी के अलावा प्रांतीय परिषद सदस्य मातादीन पासी के अलावा हरचन्दपुर ब्लाक के रहने वाले एक कद्दावर भाजपा नेता के करीबी रामप्रकाश पासी दौड़ में रहे। पहले तो चर्चा आई की पूर्व विधायक राजाराम त्यागी का टिकट फाइनल है, और वह प्रचार प्रसार में जुट गए। लेकिन उम्मीदवारों की पहली सूची जारी हुई, तो उसमें पूर्व विधायक राजाराम त्यागी का नाम नदारद था। उनकी जगह हरचंदपुर ब्लॉक के गुनावर का मंगलपुर गांव निवासी रामप्रकाश पासी अधिकृत प्रत्याशी घोषित कर दिए गए। जैसे ही यह सूचना वायरल हुई भाजपा की आंतरिक राजनीति में भूचाल आ गया।

   रातो रात जिले से लेकर प्रांतीय नेतृत्व तक दौड़ भाग के बाद प्रदेश अध्यक्ष ने स्पष्ट कर दिया कि, राजाराम त्यागी ही भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी होंगे। इसके बाद भी दो अन्य दावेदारों द्वारा कोशिशें जारी रखी गई। लेकिन मोहर त्यागी के नाम की ही लगी, और सबसे खास बात यह रही कि, प्रदेश में पहली सूची में दो-दो संशोधन हुए, उसमें एक नाम त्यागी का ही रहा। चुनाव प्रचार शुरू हुआ लेकिन टिकट मांगने वाले बचे दोनों प्रत्याशियों ने प्रदेश नेतृत्व द्वारा भेजे गए पदाधिकारियों द्वारा मान मन अव्वल अनुशासनात्मक कार्यवाही की चेतावनी दिए जाने के बावजूद भी नाम वापस नहीं लिया, और चुनाव मैदान में अंतिम दिन तक डटे रहे।

    इनके समर्थकों का कहना था कि, अगर हम जीतेंगे नहीं, तो अधिकृत प्रत्याशी को जीतने भी नहीं देंगे। भाजपा जिला नेतृत्व उन्हें मनाने समझाने में पूरी तरह नाकाम रहा। मतदान हो गया, इसके बाद अनधिकृत प्रत्याशी और उनके समर्थक दावा कर रहे हैं कि, "हम तो डूबेंगे ही सनम, तुमको भी ले डूबेंगे"। अब रही बात सपा खेमे की तो यहां पर दो बार विधायक रह चुके रामलाल अकेला ने अपने पुत्र विक्रांत अकेला को सपा का अधिकृत प्रत्याशी बताते हुए मैदान में उतार दिया, और विधानसभा चुनाव की तर्ज पर ताबड़तोड़ प्रचार कार्य शुरू कर दिया। अकेला का कहना था कि, यह सीट परंपरागत रूप से उनकी सीट है। यहां से टिकट मिल गया, तो सपा की जीत सुनिश्चित है, और उन्होंने पूरी ताकत से पार्टी द्वारा विक्रांत अकेला को टिकट दिए जाने का एड़ी से चोटी तक जोर लगा दिया, लेकिन मामले में उस समय विष्ठ आ गया, जब बसपा से एक बार विधायक रह चुके इसी क्षेत्र के निवासी श्यामसुंदर भारती ने अपनी पत्नी चंद्र कली को मैदान में उतारकर पार्टी के सामने प्रस्ताव रखा कि, यह उनका गृह क्षेत्र है। यहां उनकी अच्छी पकड़ है। इसलिए पार्टी टिकट उनकी पत्नी को दें। वह सीट जीतकर सपा की झोली में डाल देंगे। श्री भारती के समर्थन में सपा का एक बड़ा घड़ा लगातार पैरवी करता रहा। दोनों पक्षों की दमदार दावेदारी से जिला नेतृत्व अनिर्णय की स्थिति में आ गया, और पार्टी नेतृत्व ने धमाचौकड़ी ज्यादा होते देख, यहां किसी को भी टिकट नहीं दिया और दोनों प्रत्याशी एक ही पार्टी का होने के बावजूद पूरे चुनाव के दौरान एक दूसरे की टांग खिंचाई में जुटे रहे।

    राजनीतिक पंडितों ने पूरे समय यह चर्चा रही कि, दोनों प्रत्याशी इस कोशिश में रहे, चाहे कोई भी जीत जाए पार्टी में उनका प्रतिद्वंदी किसी कीमत पर न जीते, हालांकि बाहरी तौर पर दोनों ही प्रत्याशी और उनके समर्थक चुनाव में बाजी मार लेने का दंभ भरते फिर रहे हैं। इसी प्रकार बसपा ने एक सामान्य कार्यकर्ता बजरंगी पासी को मैदान में उतारा, तो उसके पीछे भी बसपा में रहे पासी बिरादरी के ही कई लोगों ने मैदान में उतर कर जातीय वोटों में सेंध लगाकर उस को कमजोर करने की पुरजोर कोशिश मतदान के आखरी समय तक जारी रखी, तो वहीं कांग्रेस द्वारा छेदीलाल पासी को उम्मीदवार बनाकर काफी देर में मैदान में उतारा गया। फिर भी कांग्रेसी टिकट मांग रहे दो तीन लोगों ने अपने परिचय दाखिल कर दिए। उनका मकसद साफ था कि, ना वह खुद जीतेंगे, और ना ही कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी को जीतने देंगे। पूरे चुनाव में बड़े दलों के प्रत्याशियों का हाल यह रहा कि, एक ओर जहां वह अपने विपक्षी दलों से लोहा लेते रहे, तो वहीं उनके पीछे उन्हीं की पार्टी के लोग उनकी टांग खिंचाई में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे थे। अब तो मतगणना 2 मई 2021 को शुरू हो जाएगी। तब पता चलेगा कि, किसके मंसूबे कितने कामयाब हुए।

    रही बात पार्टी के जिला नेतृत्व की, तो भाजपा में जिला नेतृत्व पूरी तरह से पार्टी में सामंजस्य बैठाने में विफल रहा। वहीं सपा यह कह कर बचाव करती दिखी कि, उसने किसी को टिकट ही नहीं दिया।

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