"शहीद - नामा" कमल बाजपेयी

दिखे कभी वह लहू रूप में,
मिले कभी लोहा बनकर,
शौर्य हमारे वीरो का वह,
दुश्मन सहे कहर दुष्कर ।
नहीं सोचते अपना कुछ भी,
ना सपनो मे सैर करें,
भारत माता रक्षा हित वह,
मरने से भी नहीं डरें ।
कठिन ज़िंदगी चौकस रहते,
खाना - सोना भूल गए,
रहे सुरक्षित देश हमारा,
छाती पर सब झेल गए ।
मिली वीरगति माँ चिल्लायी,
कर्ज दूध का अदा सपूत,
पत्नी बोली बलि - बलि जाऊं,
पिया तुम्हे है कोटि सलूट ।
पापा पी गए अपने आँसू,
काश और होते जो पूत,
अभी भेजता बदला लेने,
हुआ गर्व से माथा ऊँच ।
बेटा अड़ा - पड़ा था ज़िद में,
मौका अगर एक मिल पाता,
दस सिर काटूँ मचे तबाही,
पापा रुका नहीं अब जाता ।
बेटी बोली मैं क्षत्राणी,
काली दुर्गा मेरा रूप,
फौज बनी है दुर्ग वाहिनी,
छाँव न देखूँ ना मैं धूप ।
नहीं सोचता जीना मरना,
भारत माँ की रक्षा करना,
मरकर भी वह अमर हो गए,
भारत माँ के वीर सपूत ।
तुम्हे नमन है मेरा प्रियवर,
करे गर्व सौ तीस करोड़,
कमल तुम्हें अर्पित है वीरों,
दुश्मन का सिर दिया मरोड़ ।
~ By कमल बाजपेयी

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